कुछ दिन पहले ही एक सरकारी नौकरी में भर्ती हुआ हूँ......काफी व्यस्त रहता हूँ मैं यहाँ पे....नहीं नहीं..काम से नहीं..काम की तलाश मुझे व्यस्त रखती है.....पहले तो बड़ा अजीब लगा....आत्मग्लानी सी हुई की मैं लगभग २०-२५ दिनों से दफ्तर आ रहा हूँ और सिर्फ काम की तलाश करता हूँ.....खैर इस तलाश से एक फायदा भी हुआ....एक पत्रकार होने के कारण समाचार पत्र पढ़ने का मन नहीं होता था पहले..पर जबसे यहाँ इस दफ्तर में आया हूँ....काम की तलाश मुझे अनगिनत चाय की चुस्कियों और लगभग १० अख़बारों के करीब ले आयीं हैं....
काम की तलाश और भरपूर कोशिश के बावजूद काम न मिलना मेरे अंदर एक अपराधबोध सा पैदा करने लगा था....मुझे लगने लगा सभी अधिकारीयों की नज़रें मेरे ऊपर हैं....जब मैं उनके पास काम की तलाश में जाता हूँ तो वो मुझे बैठा कर समोसे चाय मिठाई और न जाने कितनी महत्त्वपूर्ण बातें कर डालतें हैं...पर काम मांगने पर सिर्फ कहते हैं....पहले उन्हें मिलने दीजिए काम फिर हम भी करेंगे काम......कमरे से बहार एक दिन निकला तो आफिस के कुछ जूनिअर कर्मचारियों नें मेरी बेचैनी भांपी और उनमे से एक सज्जन बोली....सर...मैं पिछले २२ साल से सरकारी नौकरी में हूँ.....और इन सब सालों में...मैंने केवल ३ साल ही काम करा होगा.....दूसरे बोले....सर मुझे ११ साल हो गए हैं....मैं दिन भर में सिर्फ १ घंटे काम करता हूँ.....
ये सुन कर मेरे चेहरे पे मुस्कान आ गयी.....मैं बोला चलिए...कोई काम न हो तो चाय पी ली जाये...चाय के लिए कोइ भला मन करता है.....मैंने भी अभी के लिए काम की तलाश छोड़ दी.....
जब तक काम नहीं..तब तक आराम ही सही................
